भारतवर्ष संतों, महात्माओं और धर्माचार्यों की पावन भूमि रही है। यहाँ अनेक महान संतों ने जन्म लेकर समाज को
आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। इन्हीं संतों में एक अत्यंत विशिष्ट स्थान जगद्गुरु रामभद्राचार्य
जी का है, जो दृष्टिहीन होते हुए भी अद्वितीय विद्वान, वक्ता, लेखक, कवि, धर्माचार्य और समाजसेवी हैं। वे न
केवल धार्मिक जगत में प्रसिद्ध हैं, बल्कि शिक्षा, साहित्य और दिव्यांग जनों के उत्थान में भी उनका योगदान
अतुलनीय है।
जन्म और बचपन
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का जन्म 14 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शांडीखुर्द गाँव में
हुआ था। उनका बचपन का नाम गिरिधर मिश्र था। मात्र दो महीने की आयु में एक चिकित्सा त्रुटि के कारण उन्होंने
अपनी आँखों की रोशनी सदा के लिए खो दी। परंतु इस शारीरिक दुर्बलता ने उनके मनोबल को कभी कमज़ोर नहीं किया।
गिरिधर ने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति के बल पर बाल्यकाल में ही रामचरितमानस, भगवद्गीता, वेद, उपनिषद और
पुराणों के श्लोकों को कंठस्थ कर लिया था।
शिक्षा और विद्वता
दृष्टिहीन होने के बावजूद गिरिधर जी ने कभी ब्रेल लिपि का सहारा नहीं लिया। उन्होंने श्रवण और स्मृति के बल
पर ही अध्ययन किया और वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय से संस्कृत में शास्त्री और आचार्य की उपाधियाँ प्राप्त
कीं। उन्होंने 20 से अधिक भाषाओं में पारंगतता प्राप्त की है, जिनमें संस्कृत, हिंदी, अवधी, मैथिली, उर्दू,
पालि, अंग्रेज़ी आदि प्रमुख हैं। उनकी विद्वता का प्रमाण उनके द्वारा रचित 100 से अधिक ग्रंथों और पुस्तकों
से मिलता है। वे एक उत्कृष्ट कवि, नाटककार, और आलोचक हैं। उन्होंने रामचरितमानस पर हिंदी और संस्कृत में
टीकाएँ लिखीं, जो साहित्यिक जगत में अत्यंत प्रतिष्ठित मानी जाती हैं।
आध्यात्मिक नेतृत्व
सन 1988 में उन्हें जगद्गुरु रामानंदाचार्य के रूप में नियुक्त किया गया। यह पद रामानंद सम्प्रदाय के चार
पीठों में से एक का सर्वोच्च स्थान होता है। इस पद के साथ वे आध्यात्मिक रूप से लाखों अनुयायियों के गुरु बन
गए। वे देश-विदेश में रामकथा, श्रीमद्भागवत कथा, गीता प्रवचन आदि के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार
करते हैं। उनकी वाणी में अद्भुत ओज और सरलता होती है, जिससे आम जनमानस भी गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को समझ
पाता है। उनका उद्देश्य है – “राम नाम के प्रचार से विश्व को शांत, समरस और धर्ममय बनाना।”
दिव्यांग विश्वविद्यालय
रामभद्राचार्य जी का सबसे प्रेरणादायक कार्य “जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय” की स्थापना
है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 2 जुलाई 2001 को चित्रकूट में की गई थी। यह विश्व का पहला ऐसा
विश्वविद्यालय है जो केवल दिव्यांग छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। इस विश्वविद्यालय में दृष्टिहीन,
मूक-बधिर, चलने-फिरने में असमर्थ और अन्य रूप से दिव्यांग छात्र-छात्राओं को स्नातक से लेकर शोध तक की
शिक्षा दी जाती है। यहाँ तकनीकी, साहित्यिक, सामाजिक विज्ञान, शिक्षाशास्त्र जैसे विषयों में कोर्स उपलब्ध
हैं। इसके कुलाधिपति स्वयं रामभद्राचार्य जी हैं।
साहित्य और रचनाएँ
रामभद्राचार्य जी ने विविध भाषाओं में अत्यंत उच्च कोटि के साहित्य की रचना की है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:
श्रीरामचरितमानस का तुलनात्मक भाष्य (संस्कृत और हिंदी में), गीतारामायण, रामभावेश्वरी, भावार्थ रामायण,
श्रीरामस्तव महाकाव्य, गीतावली भाष्य, कविता कौमुदी आदि। उनके साहित्य में गहराई, भक्ति, दर्शन और रस की
पूर्णता होती है। वे छंदशास्त्र, अलंकार, व्याकरण और दर्शन शास्त्र के उच्च कोटि के ज्ञाता हैं।
सम्मान और पुरस्कार
रामभद्राचार्य जी को उनके योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें भारत सरकार द्वारा
प्रदत्त पद्मविभूषण (2015), साहित्य वाचस्पति सम्मान, महामहोपाध्याय की उपाधि, कविराज, धर्मचक्रवर्ती,
विद्यावारिधि आदि अनेक मानद उपाधियाँ प्रमुख हैं।
प्रेरणा स्रोत
रामभद्राचार्य जी उन लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं जो किसी प्रकार की शारीरिक कमी के कारण अपने जीवन को
निराशा से भर लेते हैं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो कोई भी शारीरिक दुर्बलता
हमें रोक नहीं सकती। वे जीवन के हर क्षेत्र में सफल हुए — एक दर्शनशास्त्री, प्रवचनकार, विश्वविद्यालय के
कुलाधिपति, कवि, लेखक, और सबसे बढ़कर एक मानवता के सेवक।
विरासत और प्रभाव
जगद्गुरु रामभद्राचार्य न केवल एक संत हैं, बल्कि वे एक युगपुरुष हैं। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया
कि दिव्यांगता बाधा नहीं, प्रेरणा बन सकती है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिनाइयों में भी आत्मबल,
भक्ति और ज्ञान के सहारे समाज को दिशा दी जा सकती है। उनका जीवन, व्यक्तित्व और कार्य आने वाली पीढ़ियों के
लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। वे सच्चे अर्थों में “अंधकार में दीपक” हैं।